दशरथ मांझी की कहानी से आप सभी वाकिफ़ होंगे, क्योंकि बिहार के दशरथ मांझी की कहानी पर निर्देशक केतन मेहता ने ‘मांझी द माउंटेन मैन' नाम की फ़िल्म बनाई है, जो हाल ही में रिलीज़ हुई है. नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने मांझी की भूमिका बेहतरीन तरीके से निभाई है. मांझी की कहानी लोगों के दिलों को छू गई, उन्होंने 22 वर्ष में एक पहाड़ को काट कर रास्ता बनाया, क्योंकि अस्पताल जाने के लिए लोगों को वो पहाड़ पार करना पड़ता था और इसी के चलते कई लोगों और यहां तक मांझी ने अपनी पत्नी को खो दिया था. इसके बाद उन्होंने उस पहाड़ को अकेले ही काटने का निर्णय किया, सही में उनका कार्य शानदार, ज़बरदस्त, ज़िंदाबाद था.
महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में भी एक 'माउंटेन मैन' है. लेकिन 84 वर्षीय राजाराम भापकर को अब तक दशरथ मांझी जैसी ख्याति नहीं मिली है. मांझी ने एक पहाड़ काट कर रास्ता बनाया था, तो राजाराम ने भी अपने दम पर सड़कें बनाने के लिए सात पहाड़ काटे हैं. अहमदनगर जिले के गुंडेगांव में अध्यापक रह चुके राजाराम भापकर ने पूरे इलाके में 40 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने के लिए सात पहाड़ काटने में अपनी जिंदगी के 57 साल लगा दिए. इस अथक परिश्रम से उनके इलाके के लोग उनका बहुत सम्मान करते हैं. राजाराम गुरुजी के नाम से भी पहचाने जाते हैं. ये शख्स देखने में एकदम साधारण ग्रामीण नजर आता है.
सफ़ेद कमीज, पैजामा और गांधी टोपी पहनने वाले भापकर ने अपने मजबूत इरादों से पहाड़ों को भी हिला दिया. सिर्फ़ सात जमात पढ़े भापकर ने बताया कि देश की आज़ादी के समय गुंडेगांव से बगल के गांव जाने के लिए पगडंडी तक नहीं थी. जब वह कोलेगांव स्थित जिला परिषद स्कूल में 1957 से 1991 के बीच पढ़ाते थे. तब उनके गांव के लोगों को कोलेगांव जाने के लिए तीन गांवों को पार कर के जाना पड़ता था. उन्होंने अपनी जद्दोजहद का जिक्र करते हुए बताया कि सरकारी अमले से उन्होंने संतोष पर्वत को काटकर 700 मीटर की सड़क बनाने की अपील की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. इसलिए राजाराम ने खुद इस कार्य को संपन्न करने का फैसला किया.
सबसे पहले भापकर ने कोलेगांव से डेउलगांव होकर जाने वाले 29 किलोमीटर के रास्ते का छोटा विकल्प पहाड़ काटकर मात्र दस किलोमीटर लंबा कच्चा रास्ता बनाया. उनके साथ काम करने वाले ग्रामीणों को उन्होंने अपनी जेब से पैसा दिया. जिस कच्चे रास्ते पर 1968 में एक साइकिल से निकलना भी दुश्वार था, अब उसी से बड़े-बड़े वाहन गुज़रते हैं. सड़क 1997 में बनकर तैयार हुई.
वो मांझी कहते हैं न, “तुम भगवान के भरोसे बैठे हो, का पता भगवान तुम्हारे भरोसे बैठा हो!”
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