एक औलाद ऐसा भी...
मेरठ, उत्तरप्रदेश. ऐसे समय में जब हमारा अख़बार रोज़ ही औलादों द्वारा उनके माता-पिता पर किए गए दुर्व्यवहार से पटा रहता है. ठीक वैसे ही समय में कुछ ऐसी ख़बरे भी इसी मतलबी समाज से आ जाती हैं, जो सु:खद अहसास देती हैं.
देवेंद्र नामक यह शख़्स जो बागपत का रहने वाले हैं ने उनके माता-पिता को कांधे पर उठाकर कांवड़ यात्रा में शामिल हुए हैं. कलियुग के इस श्रवण कुमार को आज जो भी देखता है, वह आश्चर्य और श्रद्धा से सिर झुका लेते हैं. देवेंद्र हरिद्वार से गंगा जल लेकर महाशिवरात्रि पर उनके माता-पिता के हाथों से शिव का अभिषेक करने में सहयोग करेंगे.
देवेंद्र नामक यह शख़्स जो बागपत का रहने वाले हैं ने उनके माता-पिता को कांधे पर उठाकर कांवड़ यात्रा में शामिल हुए हैं. कलियुग के इस श्रवण कुमार को आज जो भी देखता है, वह आश्चर्य और श्रद्धा से सिर झुका लेते हैं. देवेंद्र हरिद्वार से गंगा जल लेकर महाशिवरात्रि पर उनके माता-पिता के हाथों से शिव का अभिषेक करने में सहयोग करेंगे.
सतयुग में हुए थे श्रवण कुमार...
कहा जाता है कि आज से हज़ारों साल पहले सतयुग में श्रवण कुमार भी अपने माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर चारो धाम की यात्रा पर निकले थे. रास्ते में उनके माता-पिता के प्यास लगने पर वे पास के सोते में जल लेने गए तो उसी समय शिकार पर गए राजा दशरथ द्वारा चलाए गए शब्द भेदी बाण से उनकी जान चली गई. हालांकि राजा दशरथ ने यह बाण किसी जानवर के सोते पर जल पीने के अनुमान को लेकर चलाया था, जिससे यह अनर्थ हो गया. जब इस दुर्घटना की सूचना श्रवण कुमार के माता-पिता तक पहुंची तो, उन्होंने राजा दशरथ को श्राप दे दिया कि, उनकी मौत भी उनके सबसे प्रिय पुत्र के विरह और वियोग में होगी.
अब वो पुरानी बात कहां रही...
कांवड़ यात्रा का यदि इतिहास देखा जाए तो किसी जमाने में यह पवित्रतम् और अध्यात्मिक यात्राओं में शुमार किया जाता था. देवेंद्र जैसे कुछ मुट्ठी भर लोगों को यदि छोड़ दिया जाए तो आज की कांवड़ यात्राएं गुरु घंटालों, कानफोड़ू संगीत, मारपीट, विवादों और दिखावे का प्रतीक बन चुकी हैं, जिसमें से धर्म तो कतई गायब हो चुका है. जहां कांवड़ यात्रा का मतलब डीजे की तेज आवाज़ पर बजने वाले धुनों पर नशे में धुत्त नवयुवकों और अधेड़ों का फूहड़ नृत्य व प्रदर्शनी मात्र ही रह गया है.
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