बेवकूफ़’ एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही लोगों के कान खड़े हो जाते हैं. भला कोई अपने आप को बेवकूफ़ क्यूं कहलाना चाहेगा. संसार में हर किसी को बुद्धिजीवि बनने की पड़ी है, हर एक बात पर लेक्चर छांटना अच्छा लगता है.
आज हम एक होटल के बारे में बात करने जा रहे हैं. उसके खाने के बारे में नहीं और न ही उसकी सुंदरता के बारे में, बल्कि उसके नाम के बारे में. आपने अलग-अलग नाम वाले होटल्स देखें होंगे, लेकिन क्या आपने किसी होटल का नाम ‘बेवकूफ़’ सुना है? नहीं न?
तस्वीर में आपको बेवकूफ़ होटल नाम का एक बैनर दिख रहा होगा. ये होटल झारखंड के गिरीडीह में है. इसके अतिरिक्त ऐसे ही मिलते-जुलते नाम से कुछ और होटल भी हैं.
बेवकूफ़ का इतिहास
जो चीज़ आज वर्तमान में मौजूद है उसका इतिहास ज़रूर होता है. बेवकूफ़ होटल सबसे पहले 1971 में गोपी राम ने खोला था. सस्ता और ज़ायकेदार खाना उपलब्ध करवाने के चलते होटल ने धूम मचा दी थी. गोपी राम ने ताउम्र विवाह नहीं किया. फ़िलहाल उनके होटल के वारिस उनके भतीजे प्रदीप कुमार हैं.
‘चाचा बहुत इनोवेटिव थे’
बेवकूफ़ होटल चलाने वाले प्रदीप कुमार का कहना है कि ‘उनके चाचा गोपी राम बहुत ही इनोवेटिव शख़्स थे. तभी तो उन्होंने इस होटल को बेवकूफ़ नाम दिया. ’ इस होटल को इतना नाम मिला है कि इस तरह के लगभग 7 और होटल खुल चुके हैं.
नाम से ही है क्रेज़
इसके अलावा श्री बेवकूफ़ रेस्तरां, महाबेवकूफ़ होटल अन्य 5 नाम भी ऐसे ही मिलते-जुलते हैं. यहां शाकाहारी थाली 35 रुपये और मांसाहारी थाली 80 रुपये तक मिलती है.
मुंबई में भी खोला था होटल
श्री बेवकूफ़ रेस्तरां चलाने वाले अशोक भदानी के बेटे नीरज ने मुंबई के लिंक रोड पर भी इसी नाम से एक होटल खोला था. लेकिन काम ठीक से जम नहीं पाया जिसके कारण होटल का शट्टर जल्द ही बंद हो गया.
लेकिन ये बात सच में काबिल-ए-तारिफ़ है, जहां फ़ोन भी स्मार्ट होते जा रहे हैं वहीं कुछ ऐसे अलहदा नाम और काम का टश्न आज भी बरकरार है.
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