एक ऐसे समय में जब हमें रोज ही सांप्रदायिक दंगे-फसादों की ख़बरें सुनने को मिल रही हों. जहां लोग एक दूसरे को मारना ही धर्म मान चुके हों, जहां सामाजिक अनियमितता ही नियम बन गया हो. मगर इन सभी झंझावातों के बीच हम-सभी भूल जाते हैं कि धर्म समुदायों को बांटने के बजाय जोड़ता भी है. हमारे धर्म में आज भी ऐसे कई लोग हैं, जिन्होंने धर्म की वास्तविक परिभाषा को और भी परिमार्जित किया है.
आगरा के शमशाबाद इलाके में सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ने के कुछ दिनों के भीतर ही उत्तर प्रदेश के ही कानपुर शहर से एक बहुत अच्छी ख़बर आ रही है. एस. अहमद (मुसलमान) जो कि कानपुर के बर्रा विश्व बैंक इलाके में रहते हैं, उनके तीन बच्चों और पत्नी के साथ पिछले 29 वर्षों से जन्माष्टमी मना रहे हैं. वे हर वर्ष श्री कृष्ण की झांकी सजाते हैं, और पूरे समर्पण भाव से कृष्ण पूजन करते हैं.
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एस. अहमद टाइम्स ऑफ इंडिया अख़बार से बातचीत में कहते हैं कि कृष्ण जन्माष्टमी के उत्सव ने उनकी ज़िंदगी को ख़ुशियों से भर दिया है. वे बताते हैं कि वे उनके परिवार के साथ पिछले 29 वर्षों से जन्माष्टमी का उत्सव मना रहे हैं, और उनकी श्री कृष्ण में अपार श्रद्धा है.
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वे बताते हैं कि उन्हें ऐसा करने की प्रेरणा देवा शरीफ से मिली थी, यह सूफी संत वारिस अली शाह का पवित्र स्थल है. यहां हिन्दू और मुस्लिम दोनों संप्रदायों के लोग पूजा-पाठ और दुआ के लिए आते हैं.
ठीक उसी तरह आज अहमद भाई के घर पर भी हिन्दू और मुस्लिम धर्म के लोग श्री कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव में शामिल होते हैं. दोनों ही धर्म अहमद भाई की इस भलमनसाहत के कायल हैं, और इसे हिन्दू-मुस्लिम एकता की अद्भुत मिसाल मानते हैं.
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