किचन जब मंदिर बन जाए
रंजनी ए सिंह इस लेख में बताते हैं कि ओरछा के राम राजा मंदिर में राम की पूजा एक राजा की तरह होती है न कि भगवान के रूप में।
खजुराहो की ओर जाने वाले लोगों के लिए ओरछा केवल एक विश्राम स्थल भर है। 180 किमी दूर स्थित मंदिरों की स्थापत्य कला को देखने की जल्दबाजी में पर्यटक इसके खूबसूरत मंदिरों और नदियों को देखने से खुद को वंचित कर लेते हैं।
मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में स्थित ओरछा शहर को 16वीं शताब्दी में बसाया गया था। ओरछा शब्द का मतलब है ‘छिपा हुआ’ और ये वही जगह है जहां बुंदेलखंड के राजा ने उस समय शरण ली थी जब 15वीं शताब्दी में दिल्ली में शासन करने वाले तुगलकों ने हमला कर उन्हें गरखुंदर के बाहर ढकेल दिया था। बुंदेला शासकों के 16वीं और 17वीं शताब्दी में बनाए गए महलों और मंदिरों का प्राचीन आकर्षण अभी भी बना हुआ है। बेतवा नदी के तट से आप मंदिरों के ऊंचे शिखरों और स्मारकों की एक शानदार छटा देख सकते हैं। क्षेत्र के आसपास बिखरे छोटे मंदिरों और स्मारकों में प्रत्येक का अपना मार्मिक इतिहास ओरछा की सुंदरता में चार चांद लगा देता है।
राजा के तौर पर एक भगवान
सबसे ज्यादा दिलचस्प मंदिर महल से मंदिर में बदला गया ‘राम राजा मंदिर’ है। ये शायद अकेला ऐसा मंदिर है जहां राम की एक भगवान के रूप में नहीं बल्कि राजा के तौर पर पूजा की जाती है। क्या ये उन श्रद्धांलुओं पर कोई फर्क डालता है जो भौतिक और आध्यात्मिक लाभ के लिए प्रार्थना करते हैं? अपने राजा राम को फूल और मिठाइयां चढ़ाने आई भीड़ की तरफ अपना हाथ हिलाते हुए मंदिर के पुजारी कहते हैं कि ‘नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है।’ बरामदे में दीपों के लिए कपास की बाती बना रहे एक दूसरे शख्स ने बीच में रोकते हुए कहा कि “आखिरकार इस संसार को गलत ताकतों से मुक्ति दिलाने के लिए विष्णु ने एक राजा के तौर पर ही तो अवतार लिया था।”
राम राजा मंदिर और उसके सामने बने चतुर्भुज मंदिर का एक साथ ही जिक्र किया जाता है। उन मंदिरों से जुड़ी एक आकर्षक कथा है।
वह हिलता नहीं
इस कथा के मुताबिक बुंदेला राजघराने की एक महारानी गणेश कुंवर ने अयोध्या की यात्रा के दौरान राम की एक मूर्ति ओरछा ले जाने की इच्छा जाहिर की। देवता सहमत हो गए लेकिन उन्होंने एक शर्त रख दी कि उन्हें कहीं बीच में नहीं रखा जाएगा और अगर ऐसा हुआ तो वो ओरछा नहीं जाएंगे।
अयोध्या जाने से पहले रानी ने मूर्ति को रखने के लिए एक भव्य मंदिर बनाने का आदेश दे दिया था। जब रानी अयोध्या से लौंटी तो अभी मंदिर निर्माण के आखिरी दौर में था और उसके रंगाई-पुताई का काम जारी था। नतीजतन राम की शर्त को भूलकर रानी ने मूर्ति को रसोई में रख दिया।
जब मूर्ति को स्थापित करने के लिए तय मंदिर बनकर तैयार हो गया तो कोई उसे अपनी जगह से हिला ही नहीं पा रहा था। उन्होंने रानी को अपनी शर्तों की याद दिलाई और फिर जहां थे उन्होंने वहीं रुकने का फैसला किया। और इस तरह से रसोई को ही एक मंदिर में तब्दील कर दिया गया।
खाली जगह का स्थान लक्ष्मी नारायण ने लिया
लेकिन अब समस्या ये थी कि वहां कोई देवता नहीं थे जिनको मंदिर में स्थापित किया जा सके। बाद में रानी के पति राजा मधुकर शाह लक्ष्मी नारायण की एक मूर्ति लाए और उसे मंदिर में स्थापित कर दिया गया। क्योंकि देवता के चार हाथ थे इसलिए मंदिर का नाम चतुर्भुज पड़ गया। दूसरे संकरे मंदिरों के विपरीत प्रकाश और खाली स्थानों की प्रचुरता इस मंदिर का एक अनोखा पक्ष है। यहां तक कि इसका गर्भगृह भी बेहद बड़ा है।
चतुर्भुज मंदिर एक बड़ी अवधारणा है और यूरोपीय गिरिजाघरों की तरह बहुत विशाल है। कमल के प्रतीक और धार्मिक महत्व के अन्य प्रतीकों के साथ सजा मंदिर का बाहरी दृश्य मन को प्रसन्न कर देता है। चुतुर्भुज मंदिर के खूबसूरती से खुदे हुए तिकोने आकार के शिखर मंदिर के आकर्षण को और बढ़ा देते हैं। मंदिर में ध्यान लगाने के लिए एक बड़ा हॉल है जो श्रद्धालुओं खासकर कृष्ण भक्त संप्रदाय के लोगों के आकर्षण का केंद्र है। ऐसा कहा जाता है कि राजा मधुकर शाह ने मंदिर के शिखर पर सोने का एक कलश बनवाया था लेकिन इसकी स्थापना के कुछ सालों बाद ही चोर उसको उठा ले गए।
ऐसा लगता है कि ओरछा में फैला शांति का वातावरण राजा राम मंदिर से ही निकलता है- ये उसी तरह से शायद है जैसे राजा खुद मानसिक तौर पर शांत थे और बहुत मीठी जबान बोलते थे। शाम को दोनों मंदिरों में होने वाली आरती में उपस्थिति किसी यादगार अनुभव से कम नहीं है। कोई मंदिर छोड़कर जाता है तो राम के महान गुण, उनकी सरलता और सभी के साथ समान व्यवहार की उनकी प्रकृति उसके जेहन के हिस्से में बस जाती है।
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