मनुष्य के अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य मस्तिष्क की प्रगति होना चाहिए, डॉ. भीम राव अंबेडकर
बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर उन कुछेक लोगों में से थे जिनमें जाति और समाज को सम्पूर्णता में देखने की क्षमता थी. शायद यही वजह है कि आज भी हमारे समाज का वंचित तबका उनकी तरफ़ उम्मीद भरी नज़रों से देखता है. हालांकि जाति आज भी हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई है, जो राजनीति से लेकर सारी वैकल्पिक व्यवस्थाओं को सीधे प्रभावित करती है. आज जब हमारा देश इक्कीसवीं सदी में चल रहा है, और हम मंगल से लेकर पूरे ब्रम्हांड में सैटेलाइट्स भेज रहे हैं. इसके बावजूद हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा है जो आज भी हासिए पर ज़िंदगी गुजर-बसर करने को मजबूर है. मुंबई में रहने वाले 36 वर्षीय सुनील यादव भी उसी हासिए पर रहने वाले वंचित समाज का हिस्सा है.
सुनील मुंबई के बाशिंदे हैं और वे शिक्षा के महत्व को बखूबी समझते हैं. उनके पास कुल चार शैक्षणिक डिग्रियां हैं, जिनमें से एक देश-दुनिया के प्रख्यात टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) की मास्टर डिग्री भी है, वे वर्तमान में एम.फील पूरा कर रहे हैं – जो एक एडवांस्ड पोस्टग्रेजुएट डिग्री है.
सुनील एक सफाईकर्मी हैं. यदि ठेठ भाषा में कहा जाए तो वे मैला (मल) साफ करने और कूड़ा-कचरा उठाने का काम करते हैं. सामान्य तौर पर यह सारे काम दोयम दर्जे के माने जाते हैं, जिन्हें समाज में सबसे निचले पायदान पर धकेल दिए गए “दलितों” हिन्दू और मुस्लिम धर्म के जिम्मे छोड़ दिया गया है. इन्हें हमारा तथाकथित अगड़ा समाज अछूत कहता है और उनसे जानवरों से भी बुरा व्यवहार करता है.
सुनील मुंबई के बाशिंदे हैं और वे शिक्षा के महत्व को बखूबी समझते हैं. उनके पास कुल चार शैक्षणिक डिग्रियां हैं, जिनमें से एक देश-दुनिया के प्रख्यात टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) की मास्टर डिग्री भी है, वे वर्तमान में एम.फील पूरा कर रहे हैं – जो एक एडवांस्ड पोस्टग्रेजुएट डिग्री है.
सुनील एक सफाईकर्मी हैं. यदि ठेठ भाषा में कहा जाए तो वे मैला (मल) साफ करने और कूड़ा-कचरा उठाने का काम करते हैं. सामान्य तौर पर यह सारे काम दोयम दर्जे के माने जाते हैं, जिन्हें समाज में सबसे निचले पायदान पर धकेल दिए गए “दलितों” हिन्दू और मुस्लिम धर्म के जिम्मे छोड़ दिया गया है. इन्हें हमारा तथाकथित अगड़ा समाज अछूत कहता है और उनसे जानवरों से भी बुरा व्यवहार करता है.
हर नया कोर्स, एक नई जंग
सुनील के पास इतनी डिग्रियों के होने के बावजूद उन्हें रोजगार देने वाली संस्था – बृहन्मुंबई महानगरपालिका ने किसी भी तरह के प्रोत्साहन से मना कर दिया है.
उनकी आज-कल की दिनचर्या पर गर गौर करें तो पायेंगे कि, वे रात को पूरे शहर के अलग-अलग हिस्सों से कूड़ा-करकट साफ करते हैं और दिन के वक्त पढ़ाई करते हैं.
यदि सरकार के नियमों को ही मानें तो हर वो कर्मचारी जो पढ़ाई कर रहा है को अवकाश लेने की छूट होती है. मगर वहीं सुनील बताते हैं कि उनके हालिया अवकाश के आवेदन को स्वीकार नहीं किया गया.
उनकी आज-कल की दिनचर्या पर गर गौर करें तो पायेंगे कि, वे रात को पूरे शहर के अलग-अलग हिस्सों से कूड़ा-करकट साफ करते हैं और दिन के वक्त पढ़ाई करते हैं.
यदि सरकार के नियमों को ही मानें तो हर वो कर्मचारी जो पढ़ाई कर रहा है को अवकाश लेने की छूट होती है. मगर वहीं सुनील बताते हैं कि उनके हालिया अवकाश के आवेदन को स्वीकार नहीं किया गया.
सुनील बीबीसी के साथ बात-चीत के दौरान बताते हैं कि, जब वे एक अधिकारी से शैक्षणिक अवकाश के बाबत मिले तो उसने कहा कि, यदि वह उन्हें अवकाश देता है तो उसे सभी को अवकाश देना पड़ सकता है. और आख़िर उन्हें इस पढ़ाई-लिखाई से क्या हासिल होगा. सुनील कहते हैं कि वहां का प्रशासन उन सभी से गुलामों की तरह व्यवहार करता है.
सुनील के लिए हर नए कोर्स में दाखिला लेना उनके लिए नई दिक्कतें लेकर आता है. सुनील की मास्टर्स डिग्री के दौरान अवकाश हेतु उन्हें ख़ासा प्रदर्शन करना पड़ा था, तब जाकर प्रशासन उनकी मांगों के समक्ष झुका था.
मुबई की नगरपालिका देश की सबसे अमीर नगरपालिका है. यह 28,000 से ऊपर संरक्षणकर्मियों और लगभग 15,000 कर्मचारियों को संविदा पर रोजगार दी हुई है.
मैला ढोने पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सन् 2013 में पाबंदी लगा दी गई है, हालांकि देश के अलग-अलग हिस्सों में यह आज भी प्रचलित है. इस क्षेत्र में कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ताओं की मानें तो आज भी 10,000 से अधिक लोग इस गैरप्रतिष्ठित कार्य को करने हेतु मजबूर हैं.
मैला ढोने के कारोबार पर रोक लगाने और उन्हें पुनर्स्थापित करने वाले कानून का देश के अलग-अलग राज्यों में आज भी बढ़िया से पालन नहीं हो रहा है. इस कानून से बच निकलने के लिए विभिन्न नगरपालिकाएं भी उनकी शब्दावलियों में थोड़ा-बहुत फेर-बदल कर लेते हैं. जैसे मैला ढोने की प्रक्रिया में इस बात का साफ जिक्र है कि कोई भी शख़्स उसके नंगे हाथों का इस्तेमाल नहीं करेगा. नगरपालिका ने इस कायदे-कानून से लड़ने के लिए उन्हें फावड़ा और बाल्टी थमा दी है.
मैला ढोने पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सन् 2013 में पाबंदी लगा दी गई है, हालांकि देश के अलग-अलग हिस्सों में यह आज भी प्रचलित है. इस क्षेत्र में कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ताओं की मानें तो आज भी 10,000 से अधिक लोग इस गैरप्रतिष्ठित कार्य को करने हेतु मजबूर हैं.
मैला ढोने के कारोबार पर रोक लगाने और उन्हें पुनर्स्थापित करने वाले कानून का देश के अलग-अलग राज्यों में आज भी बढ़िया से पालन नहीं हो रहा है. इस कानून से बच निकलने के लिए विभिन्न नगरपालिकाएं भी उनकी शब्दावलियों में थोड़ा-बहुत फेर-बदल कर लेते हैं. जैसे मैला ढोने की प्रक्रिया में इस बात का साफ जिक्र है कि कोई भी शख़्स उसके नंगे हाथों का इस्तेमाल नहीं करेगा. नगरपालिका ने इस कायदे-कानून से लड़ने के लिए उन्हें फावड़ा और बाल्टी थमा दी है.
यहां सब-कुछ परिवार की विरासत है?
सुनील के पिता भी मैला ढोने का काम किया करते थे. और जैसा की इस समाज में प्राय: होता आया है. यह ज़िम्मेदारी उनके पिता से होते हुए सुनील पर आ गई.
कई पढ़े-लिखे लोगों को भी मजबूरन यह काम करना पड़ता है, क्योंकि उन्हें और किसी काम के लिए ठीक ही नहीं माना जाता.
उन्हें उनकी जाति और वर्ग की वजह से कभी भी किसी तरह की तरक्की और प्रोत्साहन से नहीं नवाज़ा जाता. सुनील बताते हैं कि सन् 2014 में उन्होंने लेबर वेलफेयर अफ़सर के पद हेतु निवेदन किया था, जिसे टेक्नीकल कारणों के हवाले ठुकरा दिया गया. वे कहते हैं कि, “उन्हें यह नहीं समझ आता कि आख़िर उन्हें उनकी क्षमता के अनुसार काम करने हेतु क्यों प्रोत्साहित नहीं किया जाता.”
ऐसा नहीं है कि, सुनील यादव ही इस तरह के एक मात्र उदाहरण हैं. जब प्रमोद जाधव नामक एक और शख़्स जो सफाईकर्मी हैं ने राजनीति शास्त्र में मास्टर्स डिग्री पूरी करने के बाद उच्च पदों हेतु आवेदन किया, तो उनके आवेदन पर कोई विचार नहीं किया गया.
कई पढ़े-लिखे लोगों को भी मजबूरन यह काम करना पड़ता है, क्योंकि उन्हें और किसी काम के लिए ठीक ही नहीं माना जाता.
उन्हें उनकी जाति और वर्ग की वजह से कभी भी किसी तरह की तरक्की और प्रोत्साहन से नहीं नवाज़ा जाता. सुनील बताते हैं कि सन् 2014 में उन्होंने लेबर वेलफेयर अफ़सर के पद हेतु निवेदन किया था, जिसे टेक्नीकल कारणों के हवाले ठुकरा दिया गया. वे कहते हैं कि, “उन्हें यह नहीं समझ आता कि आख़िर उन्हें उनकी क्षमता के अनुसार काम करने हेतु क्यों प्रोत्साहित नहीं किया जाता.”
ऐसा नहीं है कि, सुनील यादव ही इस तरह के एक मात्र उदाहरण हैं. जब प्रमोद जाधव नामक एक और शख़्स जो सफाईकर्मी हैं ने राजनीति शास्त्र में मास्टर्स डिग्री पूरी करने के बाद उच्च पदों हेतु आवेदन किया, तो उनके आवेदन पर कोई विचार नहीं किया गया.
यहां पल-पल संघर्ष है...
वे कहते हैं कि उनके पहचान पत्र और सैलरी स्लिप पर सफाईकर्मी लिखा होना ही शोषण की शुरुआत है. येह बेहद जातिगत है. प्रशासन उनसे गिद्धों की तरह व्यवहार करता है, जो प्राकृतिक सफाईकर्मी हैं.
जब उनसे पूछा जाता है कि, आप इतने शिक्षित और काबिल हैं और यहां स्थितियां इतनी ही भयावह हैं तो वे कहीं क्यों नहीं चले जाते?
वे बताते हैं कि यहां नगरपालिका के लिए काम कर रहे कर्मचारियों को सरकारी आवास दिया जाता है. अगर वे सरकारी नौकरी छोड़ देते हैं तो उन्हें घर भी छोड़ देना पड़ेगा. वे कहते हैं कि यहां मुंबई में किराया इतना महंगा है कि उनके लिए सम्भव ही नहीं है कि वे किराए पर मकान लेकर रह पायेंगे.
इस सारी प्रक्रिया पर प्रतिक्रिया देते हुए, दलित चिंतक और राजनीतिक कार्यकर्ता चंद्र भान प्रसाद कहते हैं कि, “रोजगार इस जातिगत व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है. यदि वे इसी तरह नगरपालिका में काम करते रहेंगे, तो वे गुलामी के भी समर्थक बने रहेंगे. उन्हें रोजगार को जाति से अलग करके देखना होगा, और ऐसे रोजगार को लात मारनी होगी. सिर्फ़ यही है जो इस जड़ हो चुकी व्यवस्था को झकझोर सकता है.”
जब उनसे पूछा जाता है कि, आप इतने शिक्षित और काबिल हैं और यहां स्थितियां इतनी ही भयावह हैं तो वे कहीं क्यों नहीं चले जाते?
वे बताते हैं कि यहां नगरपालिका के लिए काम कर रहे कर्मचारियों को सरकारी आवास दिया जाता है. अगर वे सरकारी नौकरी छोड़ देते हैं तो उन्हें घर भी छोड़ देना पड़ेगा. वे कहते हैं कि यहां मुंबई में किराया इतना महंगा है कि उनके लिए सम्भव ही नहीं है कि वे किराए पर मकान लेकर रह पायेंगे.
इस सारी प्रक्रिया पर प्रतिक्रिया देते हुए, दलित चिंतक और राजनीतिक कार्यकर्ता चंद्र भान प्रसाद कहते हैं कि, “रोजगार इस जातिगत व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है. यदि वे इसी तरह नगरपालिका में काम करते रहेंगे, तो वे गुलामी के भी समर्थक बने रहेंगे. उन्हें रोजगार को जाति से अलग करके देखना होगा, और ऐसे रोजगार को लात मारनी होगी. सिर्फ़ यही है जो इस जड़ हो चुकी व्यवस्था को झकझोर सकता है.”
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