एस्ट्रोजन के बदलाव की पद्दति ऐसी पद्दति है जिसके अंतर्गत किसी महिला के शरीर में मौजूद एस्ट्रोजन को बदला जाता है। ऐसा आमतौर पर तब किया जाता है जब वह रजोनिवृत्ति के बाद की प्रक्रिया में होती है या फिर तब जब किसी कारणवश उसके अंडाशय को शल्य क्रिया द्वारा निकाल दिया जाता है। यह वह समय होता है जब शरीर में एस्ट्रोजन उत्पन्न नहीं होता है। महिलाओं की हड्डियों का भार ३० से ३५ वर्ष की आयु तक ही बढ़ता है। जैसे जैसे किसी महिला की आयु ४५ से ५० तक पहुँचती है, वैसे वैसे उसके अंडाशय से एस्ट्रोजन का उत्पन्न होना कम हो जाता है। जैसे जैसे उनकी उम्र और बढ़ती है, ये प्रक्रिया धीरे धीरे बंद होती जाती है और रजोनिवृत्ति शुरू हो जाती है।
एस्ट्रोजन के बदलाव की थेरेपी
यह थेरेपी रजोनिवृत्ति के लक्षणों से निपटने के लिए दी जाती है जिसमें मुख्य है नींद पूरी ना होना तथा योनि का सूखना। इससे ऑस्टियोपोरोसिस से भी छुटकारा मिलता है जो कि एस्ट्रोजन की कमी की वजह से होता है। एस्ट्रोजन की थेरेपी के साथ अगर प्रोजेस्टेरोन के बदलाव की भी थेरेपी दी जाय तो यह काफी फायदेमंद होती है। इन दोनों पद्दतियों का मिलाप हॉर्मोन पद्दति कहलाता है जो कि किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा दिया जा सकता है जो इस पद्दति से होने वाले नुकसानों से वाकिफ हो।
हॉर्मोन के बदलाव तथा एस्ट्रोजन के बदलाव की पद्दति के साइड इफेक्ट्स हैं मरोड़ उठना, सूजन, स्तनों का नरम होना कभी कभी तो मासिक धर्म भी कई सालों के लिए लौटकर आ जाता है। अन्य साइड इफेक्ट्स में वज़न का बढ़ना, शरीर में द्रव्य की मात्रा बढ़ना तथा योनि से द्रव्य निकलना। इस थेरेपी के साइड इफ़ेक्ट हर प्रकार की एस्ट्रोजन थेरेपी में पाये जाते हैं, पर ये दवाओं में ज़्यादा सामान्य है तथा पैच, क्रीम तथा योनि के छल्लों में कम होते हैं। ये अपने आप गायब हो जाते हैं या फिर दवाओं में परिवर्तन करने पर इनसे छुटकारा मिल सकता है।
इस पद्दति के अन्य खतरे हैं: –
१. एस्ट्रोजन की ज़्यादा खुराक देने से अंतर्गर्भाशय का कैंसर हो सकता है। आमतौर पर जिनका गर्भाशय निकाल दिया जाता है, उन्हें प्रोजेस्टेरोन के साथ एस्ट्रोजन की कम खुराक दी जाती है। प्रोजेस्टेरोन शरीर को इस प्रकार के कैंसर से बचाता है। जिनका गर्भाशय और गर्भाशय ग्रीवा दोनों निकाल दिए जाते हैं उन्हें सिर्फ एस्ट्रोजन की खुराक दी जाती है।
२. ऐसा साबित नहीं हुआ है पर कहा जाता है कि इन दोनों पद्दतियों से स्तन कैंसर का ख़तरा रहता है।
३. इन दोनों पद्दतियों के प्रयोग से खून का थक्का भी जम सकता है। ऑस्टियोपोरोसिस के लिए दिए जानी वाली दवाइयों से कई बार नसों में खून का थक्का जम जाता है।
हॉर्मोन के बदलाव तथा एस्ट्रोजन में बदलाव की पद्दति के फायदे ये हैं कि ये ऑस्टियोपोरोसिस तथा दिल की बीमारी का ख़तरा कम करती है।यह अचानक गर्मी लगने तथा रात में पसीना आने की समस्या से भी मुक्ति दिलाती है। इन दोनों पद्दतियों से मानसिक सुकून भी पहुंचता है।
एस्ट्रोजन के बदलाव की पद्दति का मुख्य नुकसान यह है कि अगर इसे प्रोजेस्टिन के साथ ना लिया जाए तो यह स्तन एवं गर्भाशय के कैंसर का ख़तरा बढ़ा सकती है। इस पद्दति के प्रयोग के बाद कई बार लोगों में उच्च रक्तचाप की भी समस्या पाई गयी है।
स्तन कैंसर की शिकार महिलाओं को सावधानी से इस उपचार का प्रयोग करना चाहिए। सिरदर्द, अस्थमा, मधुमेह, लिवर तथा दिल की बीमारी से पीड़ित मरीज़ों के लिए यह उपचार सही नहीं है।
एस्ट्रोजन पद्दति के कार्य करने का तरीका
एस्ट्रोजन थेरेपी एक पैच, क्रीम या योनि के छल्ले द्वारा दी जाती है। इस तरह से एस्ट्रोजन सीधे रक्त में प्रवेश करता है और लिवर से होकर नहीं जाता। पिल में युक्त एस्ट्रोजन लिवर पर दबाव डालता है। एस्ट्रोजन पैच खुजली पैदा कर सकते हैं। एस्ट्रोजन योनि के छल्ले को हर ३ माह में बदलना चाहिए। अगर आप रजोनिवृत्ति के बाद के समय में शरीर में एस्ट्रोजन का स्तर बढ़ाना चाहती हैं तो एस्ट्रोजन थेरेपी एक बढ़िया उपाय है। कुछ महिलाएं अपना हिस्टेरेक्टॉमी का ऑपरेशन करवाती हैं और उनके पास गर्भाशय नहीं होता। ऐसी महिलाओं के लिए भी एस्ट्रोजन के बदलाव की पद्दति काफी अच्छा कार्य करती है। अगर किसी को हड्डियों के नुकसान की समस्या है तो वह भी इस पद्दति का प्रयोग कर सकता है।
एस्ट्रोजन पद्दति का प्रयोग कब न करें?
१. हॉर्मोन की समस्या की वजह से नींद ना आने के समय
२. अगर आपकी योनि से रक्त बह रहा हो।
३. अगर आप अंडाशय के कैंसर से पीड़ित हों।
४. अगर आपको पहले भी खून का थक्का जमने की शिकायत रही हो।
अब आप कई जगहों पर एस्ट्रोजन की पद्दति का प्रयोग कर सकते हैं। अगर आपने सही प्रकार से इस प्रक्रिया का प्रयोग किया तो आपका शरीर स्वस्थ रहेगा। इससे योनि स्वस्थ रहती है और खुजली कम होती है। यह त्वचा का कोलेजन बढ़ाने में भी मदद करता है।
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