मुम्बई के कांदिवली रेलवे स्टेशन के बाहर 37 सालों से अपने हाथों से बनाये कपड़ों के बैग बेचने वाली 77 साल की मंजुला की कहानी किसी फ़िल्म की कहानी से कम नहीं. 20 साल पहले अपने पति को खो चुकी मंजुला ने न सिर्फ़ घर की ज़िम्मेदारियों का बोझ संभाला बल्कि बच्चों को पढ़ा-लिखा कर एक कामयाब इंसान भी बनाया. उनकी एक बेटी बैंकर है और दूसरी बेटी मीडिया की पढ़ाई कर रही है.
अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए मंजुला कहती हैं कि "मेरे पति की आय इतनी नहीं थी कि वो बच्चों का पेट भर सके, इसलिये मैंने भी काम करने का फ़ैसला लिया. अपने पति के देहांत के बाद मैंने अपनी बच्चियों को पढ़ाया-लिखाया और उनकी शादियां भी की". रोज़ाना 300 से 400 कमा लेने वाली मंजुला आगे कहती हैं कि "बहुत छोटी उम्र में ही मैंने पैसों की कीमत समझ ली थी. मेरा मानना है कि आदमी और औरत में कोई फ़र्क नहीं होता. फ़र्क केवल आदमी की मानसिकता में होता है. एक औरत भी हर वो काम कर सकती है, जो एक आदमी कर सकता है. मैं दिनभर आदमियों से घिरी रहती हूं और मुझे एक आदमी ने ही इस काम की शुरुआत करने का सुझाव दिया था. पर अब मेरी आंखों की रौशनी कम होती जा रही है और मुझे बस अब अपने काम की चिंता है".
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