दूसरे देशों में जाकर भारत का नाम रौशन करने वाले खिलाड़ियों से लेकर देश के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले सैनिकों को जिस हालात में जीना पड़ रहा है, वो सही में दयनीय है. ज़रा सोचिये जिन महिलाओं और पुरुषों ने देश के लिए पदक जीते, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ाई लड़ी और यहां तक कि देश के लिए अपनी जान भी दे दी उन्हीं को गरीबी के अलावा क्या मिला? आज भी इनमें से कई शख़्स गुमनामी और गरीबी के अंधेरे में जी रहे हैं और कुछ ने तो इन्हीं हालातों में अपनी जान दे दी. इनकी असल ज़िंदगी के बारे में जान कर आप भी ये सोचने पर मजबूर हो जाएंगे, कि आखिर देश ने इनके साथ ऐसा क्यों किया!
1. राम मिलान साह: स्वतंत्रता सेनानी जो गरीबी में ही मर गए.
94 वर्षीय राम मिलान साह नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी के सदस्य थे. साथ ही उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान म्यांमार में अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ाई लड़ी थी. स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन के लिए कई बार सिफ़ारिश करने के बावजूद भी केंद्र सरकार ने उसे नज़रअंदाज कर दिया था जिसके कारण राम मिलान साह को अपनी मूलभूत ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पूर्णिया में स्थित एक अदालत के बाहर पान बेचना पड़ता था. उनकी इसी गरीबी में निधन हो गया.
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2. सीता साहू: देश के लिए मेडल लाने के बाद भी बेच रही हैं गोल गप्पे.
एथेंस मे हुए एक विशेष ओलंपिक में 200 मीटर और 1600 मीटर की दौड़ में कांस्य पदक जीतने वाली सीता गरीबी का जीवन जी रही हैं. उन्होंने यह दौड़ 15 वर्ष की अल्पायु में जीती थी. लेकिन देश का नाम रौशन करने के बावज़ूद भी वे आज सड़कों पर गोल गप्पे बेच रही हैं.
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3. अमिताभ ठाकुर: मुलायम सिंह पर आरोप लगाने के कारण इन्हें IPS सेवा से निलंबित कर दिया गया.
मुलायम सिंह यादव पर आरोप लगाते हुए उन्होंने जब पुलिस को शिकायत दर्ज़ कराई कि मुलायम सिंह ने उन्हें फ़ोन पर धमकी दी थी उसके तुरंत बाद लोक सेवक अमिताभ ठाकुर को अनुशासनहीनता और सरकार विरोधी गतिविधियों के आरोप में इस सेवा से निलंबित कर दिया गया था.
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4. शंकर लक्ष्मण: हॉकी के खिलाड़ी और सेना कैप्टन थे जो गरीबी में ही मर गए.
शंकर 60 के दशक में भारतीय हॉकी टीम के कप्तान रहे, साथ ही उन्हें अर्जुन पुरस्कार और पद्म श्री पुरस्कार प्राप्त था. 1979 में जब वे सेवानिवृत्त हुए, तब वे सेना का हिस्सा थे. लेकिन इतनी उपलब्धियों के बाद भी उन्हें बेहद कम वेतन दिया जाता था. जिसके कारण जब तक वे जीवित रहे, उन्होंने अपना जीवन गरीबी में ही बिताया.
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5. राजविंदर कौर: हॉकी खिलाड़ी जिन्होंने सरकार की लापरवाही से परेशान होकर आत्महत्या कर ली.
20 वर्षीय राजविंदर कौर ने जूनियर राष्ट्रीय हॉकी चैम्पियनशिप में पंजाब का प्रतिनिधित्व किया था. वे पुलिस सेवा में शामिल होना चाहते थे, लेकिन गरीबी के कारण कौर बीए द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम की फीस देने में असमर्थ थे. अपनी गरीबी और सरकार की लापरवाही के चलते उन्होंने पिछले साल एक चलती ट्रेन के सामने आकर खुद को मार डाला.
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6. निशा रानी दत्ता: राष्ट्रीय आर्चर जो गरीबी में जी रहीं हैं.
आर्चर निशा रानी दत्ता ने झारखंड में 2008 में आयोजित दक्षिण एशियाई फेडरेशन चैम्पियनशिप में रजत पदक जीता, 2006 बैंकॉक ग्रैंड प्रिक्स में कांस्य पदक और ताइवान में आयोजित एशियन ग्रैंड प्रिक्स में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी पुरस्कार जीता था. इसके बावजूद निशा को अपनी जीविका चलाने के लिए अपना चांदी का धनुष बेचना पड़ा. क्योंकि ये खेल उनकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने में नाकाम था.
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7. रशमिता पात्रा: फुटबॉल खिलाड़ी जो अब एक सुपारी (Betel nut) की दुकान चलाती हैं.
एक समय पहले, रशमिता ने ओडिशा को अंडर-19 राष्ट्रीय महिला फुटबॉल कप जीताने में मदद की थी और यहां तक उन्होंने कुआलालंपुर में एशियाई फुटबॉल परिसंघ के लिए अंडर-16 टूर्नामेंट में भारत का प्रतिनिधित्व किया था. हालांकि, भारत को क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों की कोई परवाह नहीं है. यही कारण है कि दूसरे खेलों से जुड़े खिलाड़ी गरीबी में जीने को विवश हैं. रशमिता भी उनमें से एक हैं और वे अब अपने परिवार के साथ एक सुपारी (Betel nut) की दुकान चलाती हैं.
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8. नौरी मुंडू: हॉकी मेडल विजेता
नौरी ने 1996 में हुए नेहरू गर्ल्स हॉकी टूर्नामेंट में कांस्य पदक जीता, 1997 में उन्होंने राष्ट्रीय वरिष्ठ खेल चैम्पियनशिप में रजत और 19 अवसरों पर राष्ट्रीय टीम का प्रतिनिधित्व भी किया. हालांकि, उन्होंने अपने अंदर हॉकी को ज़िदा रखने के लिए पढ़ना शुरू कर दिया, जिसका कारण था उस समय महिला हॉकी में Sponsorship की कमी.
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9. दुर्गा शक्ति नागपाल: रेत माफ़िया के खिलाफ़ आवाज़ उठाने पर उन्हें निलंबित कर दिया.
उत्तर प्रदेश के उप-प्रभागीय मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य करने वाली दुर्गा ने यमुना नदी के तट पर रेत खनन माफ़ियाओं पर कार्रवाई कर उनकी इस करतूत को जगजाहिर किया था. इस कार्य के चलते उत्तर प्रदेश सरकार ने उन पर हिंसा और उकसाने का आरोप लगाकर निलंबित कर दिया था. खैर, उन पर लगे आरोप सिद्ध नहीं हुए. उनके निलंबन पर देशव्यापी विरोध हुआ जिसके बाद यूपी सरकार ने उसे रद्द कर दिया था. लेकिन अब दुर्गा इस पद पर नहीं हैं जिसके चलते सरकार का भ्रष्टाचार से गठबंधन जारी है.
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10. डीके रवि: भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ने वाले इस शख़्स की हत्या कर दी गई थी.
आदर्श और साहस का इससे अच्छा उदाहरण कहीं नहीं मिल सकता, कोलार में रेत माफ़िया की चोरी सामने लाने के अलावा बंगलुरू में 120 करोड़ की टैक्स चोरी उजागर की. कुछ दिनों के बाद उनकी मौत हो गयी जिसे आत्महत्या का रूप दिया गया, पर ये रहस्यमयी मौत किसी हत्या से कम नहीं लग रही थी.
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11. मुग्धा सिन्हा: स्थानिया माफ़िया से लड़ने पर मिला ट्रांसफ़र.
स्थानिय माफ़िया के खिलाफ़ कर्रवाई करने के कारण राजस्थान के झुंझुनूं जिले की इस पहली महिला कलेक्टर को एक अलग पोस्ट पर स्थानांतरित कर दिया गया था. वे अपने इस स्टैंड पर बनी रहीं. हांलाकि, भारी जन समर्थन के बावज़ूद भी उन्हें वापस उस पोस्ट पर नहीं लिया गया था.
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12. राजू नरायण स्वामी: भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ने पर इनका 20 बार ट्रांसफ़र किया गाय.
पहले दिन से भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ने वाले राजू नारायण ने पांच जिलों के जिला कलेक्टर सहित कई पदों पर कार्य किया. अपनी सेवा के पिछले 20 वर्षों में उनका 20 से अधिक बार ट्रांसफ़र किया गया है. इसका कारण कुछ और नहीं, बल्कि उनका भ्रष्टाचार के खिलाफ़ सक्रिय रवैय्या ही था. उन्हें मजबूरन छुट्टी पर भेजा गया और कनिष्ठ पदों पर दरकिनार कर दिया गया.
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13. किशन लाल: इस सहासी Bomb diffuser को कोई क्रेडिट नहीं मिला.
किशन लाल को ‘Chacha Bomb Squad’ के नाम से भी पहचाना जाता है. 80 और 90 के दशक में पंजाब पुलिस के साथ काम कर इस शख़्स ने एक दर्ज़न से अधिक बम विस्फ़ोट को रोकने में मदद की है. हांलाकि इस काम का सारा श्रेय स्थानीय पुलिस को ही मिला. किशन लाल ने यहां तक कहा था कि ‘काम करते वक़्त हाथ घायल होने पर भी उन्हें कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया था’. 2006 में उनका निधन हो गया.
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