हमारे शरीर की मूलभूत ज़रूरत रोटी, कपड़ा और मकान है. भारत में जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है. अनाज तो हमारे लिए ज़रूरी है ही, लेकिन अनाज आयेगा कहां से? ये सोचा है कभी! उसके लिए खेती करनी होगी, अपने वातानुकुलित दफ़्तरों से निकल कर ज़मीन पर पसीना बहाना होगा. जबकि आंकड़े बताते हैं कि प्रति दिन लगभग 2500 किसान खेती करना छोड़ रहे हैं. घर में पैदा हुए बच्चे के लिए दूध ज़रूरी है, लेकिन दूध आयेगा तो गाय से ही न जनाब. हमें विलायती कुत्ते पालने का शौक़ है लेकिन अपने देश की देसी गाय से हम हिचकिचाते हैं.
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कुत्ता पालें या गाय?
टाइम्स आफ़ इंडिया अख़बार के संपादक समीर जैन ने एक वकतव्य के दौरान कहा था कि “मैं कुत्ता नहीं बल्कि गाय पालने का पक्षघर हूं”. अपने समाज में हम लोगों को देख कर जीने के चलते अपनी औकात कब भूल जाते हैं पता भी नहीं चलता. और इसी के चक्र में कूचक्र हो जाता है. लोगों की धारणा है कि गाय की पूजा करनी चाहिए, लेकिन करता कौन है? धरती को माता कहा जाता है पर हमारी गंदगी झेलने का ज़िम्मा हमारी इस धरती माता के सिर क्यों लादा गया है? क्यों इन दोनों माताओं को इतना तिरस्कार झेलना पड़ता है?
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भारत में किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? क्या उनको सुविधायें नहीं मिल रहीं? ऐसे कई सवाल उठते हैं. लेकिन जवाब तलाशने के लिए जो जद्दोजहद करनी पड़ती है उससे सब बचते हैं. यहां तक कि पढ़ा-लिखा वर्ग भी.
बीते दिन जवाब तलाशने की मेहनत करता एक शख्स दिखा. इनका नाम संजीवनी लंजेवर है. बेंगलुरू के रहने वाले संजीवनी किसी आश्रम के लिए काम करते हैं. अपनी नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने अपने लिए ही नहीं, बल्कि लोगों का भी पेट भरने के लिए काम करना शुरू किया... मतलब खेतीबाड़ी करनी शुरू की. बात को ज़्यादा गहराई नहीं देना चाहता. बेहतर होगा कि आप लोग वीडियो देखें. और अपने मकसदों को एक बार पुन: सोचने के लिए मज़बूर हो जायें.
गौर करने लायक ये बात है कि इस वीडियो को पांच लाख से भी ज़्यादा लोग शेयर कर चुके हैं. आप भी अपना सुझाव दें और इस संदेश को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचायें.
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