वर्तमान समय में हमारा देश खिलाड़ियों की बहुत इज़्ज़त करने लगा है, और जनाब करे भी क्यों न! अपनी मेहनत से देश के लिए खेलने वाले खिलाड़ी कितना पसीना और कितनी दिक्कतों के बाद मेडल ले पाते हैं ये तो वही जानते हैं. पर कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएं भी सामने आती हैं जो ये बताती हैं कि खिलाड़ियों को आज भी एक सुरक्षित माहौल और बढ़िया काम नहीं मिल पा रहा है.
मानसिक त्रासदी का दौर
ऐसी ही एक दास्तां है कानपुर के कमल कुमार वाल्मीकि की. गौरतलब है कि ये स्टेट लेवल के एथलीट रह चुके हैं लेकिन आज इन्हें कूड़ा-करकट उठाते देखा जा सकता है. एक खिलाड़ी के लिए ये कितनी बड़ी मानसिक त्रासदी है यह वही जान सकता है.
आज मेडल भी चुप हैं
इससे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश कुमार भी कमल कुमार की मेहनत के फलसफ़ों का गुणगान अपने भाषणों में कर चुके हैं. अपने मेडल दिखाते हुए कमल कुमार ख़ुद गौरवान्वित महसूस करते हैं. उन्हें उत्तर प्रदेश बॉक्सिंग चैम्पियनशीप के दौरान कांस्य पदक और स्वर्ण पदक से भी नवाज़ा जा चुका है.
पर मलाल इस बात का है कि एक खिलाड़ी अपनी पारिवारिक मजबूरियों के चलते कैसे मजदूरी करने को मजबूर हो गया. अगर उत्तर प्रदेश सरकार उन्हें स्टाईपेंड देती रहती तो शायद वो ऐसा कदम न उठाते. अगर मीडिया मुद्दे की बात को जनता तक पहुंचाता तो भी शायद कमल कुमार आज खिलाड़ी ही होता. हम नहीं जानते कि ग़लती किसकी है, लेकिन परिणाम एक खिलाड़ी ही भुगत रहा है.
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