इस बात का इतिहास गवाह है कि धर्म के मामले में सभी के अपने अलग-अलग मत होते हैं. दुनिया के मशहूर चिंतक कार्ल मार्क्स कहते थे कि “धर्म एक अफ़ीम है”. जाहिर है कि अधिकतर लोग मार्क्स की इस बात से सहमत होंगे. लेकिन जब धर्म कला के क्षेत्र में अपनी टांग अड़ाने लगे तो मामला पेंचीदा हो जाता है. ऐसी दखलंदाज़ी आज-कल हम लगातार कला के क्षेत्रों में देख रहे हैं. पेरिस में पैगम्बर मुहम्मद का आपत्तिजनक चित्र बनाने पर आतंकी हमला होता है, तो कहीं फ़िल्म में भगवान राम की आलोचना लोगों के गले नहीं उतरती. ऐसा लगता है जैसे हम चरम प्रतिक्रिया के चरम दौर में जी रहे हैं.
इस संदर्भ में बात इसीलिए की जा रही है क्योंकि ईरान के एक मशहूर निर्देशक माज़िद मज़िदी की नई फ़िल्म मुहम्मद को आलोचना झेलनी पड़ रही है. गौरतलब है कि ये ईरान की सबसे महंगी फ़िल्मों की फ़ेहरिस्त में शामिल है.
इस फ़िल्म के निर्माण पर लगभग 3.6 करोड़ यूरो खर्च हुए हैं. इसके अलावा लेखक और निर्देशक ने इस विषय पर शोध हेतु एक लंबा समय पुस्ताकलयों और देश-दुनिया की खाक छानने में बिताया है.
वर्तमान समय में इस्लाम के पक्ष-विपक्ष में बहुतेरे विचार सामने आ रहे हैं. मज़िद का कहना है कि “इस्लाम के असली मकसद और सटीक मायने को लोगों तक पहुंचाने के लिए ही उन्होंने इस फ़िल्म का निर्माण किया है.”
गौरतलब है कि फ़िल्म को बनाने में सात साल लग गये. जहां एक तरफ़ दर्शक फ़िल्म की तारीफ़ कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ़ सऊदी अरब के ग्रैंड मुफ्ती ने इसकी आलोचना की है और इसे हटाने की मांग कर रहे हैं.
इस फ़िल्म के म्यूजिक डायरेक्टर भारत के मशहूर संगीतकार ए.आर रहमान हैं, जिन्हें ऑस्कर पुरस्कार से भी नवाज़ा जा चुका है.
इस फ़िल्म की कहानी लगभग 1400 साल पुरानी है जिसमें पैगम्बर मुहम्मद के बचपन से ले कर किशोरावस्था तक का सफ़र दर्शाया गया है.
शिया समुदाय के लोग फ़िल्म के समर्थन में अपनी आवाज़ उठा रहे हैं जबकि सुन्नी सुमदाय के लोग लगातार इसकी भर्त्सना कर रहे हैं.
हमारा मानना है धर्म इंसान की ज़िंदगी का एक अभिन्न हिस्सा है मगर उसे चौखट के भीतर रखने में ही भलाई है, अन्यथा वह बहुतों के जान लेती है. आख़िर दुनिया का कौन सा ऐसा धर्म है चाहे वह हिन्दू हो या ईसाइयत या फिर इस्लाम ही क्यों न हो. उन सारे धर्मों को उनके पंडे, कठमुल्ले और पादरियों ने बजाय फायदा पहुंचाने के नुकसान ही पहुंचाया है.
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